लाटरी  ( एक दामाद की कहानी ) 

'गिरधारीलाल, मुझे पच्चीस हजार रुपयों की सख्त जरूरत है और वह भी तुरंत. प्लीज...,' प्रवेश करते ही धनंजय बोला. 'ऐसी भी क्या जरूरत आन पड़ी?' 'जी, तुरंत पटना जाना है. हवाई जहाज से....' 'आप पहले भी तो उधार ले चुके हैं. बीस-बीस हजार करके तीन मरतबा. उनमें से केवल दस हजार लौटाए हैं आपने. पचास हजार अब भी बकाया हैं. ब्याज का हिसाब तो अलग ही रहा. ऐसे कैसे चलेगा? मेरी भी तो कुछ सीमाएं हैं...!' 'जी इस बार दे दीजिए; समझिए, आखिरीबार उधार मांग रहा हूं. मेरी सास सालभर से बीमार चल रही थीं. उसी कारण बीवी को लेकर बार-बार गांव जाना पडा. सारा बजट 'अपसेट' हो गया. आज सबह-सबह साढ़ का फोन आया कि सास का रात को देहांत हो गया. लौटते ही ब्याज समेत सारा उधार चुकता कर दूंगा, आपका.' 'सालभर में नहीं चुका पाए तो अब ऐसा क्या हो जाएगा कि....''जी...मेरी बीस लाख की 'लॉटरी' लग गई है.' लॉटरी!' 'जी हाँ...लॉटरी. कुल 2 संतानें हैं सास की. वह भी पुत्रियाँ. एक मेरी बीवी और दूसरी इससे बड़ी है. वहीं पटना में ब्याही गई है, वह.... और नकद, जेवरात, मकान आदि मिलाकर कम से कम चालीस लाख की प्रॉपर्टी छोड़कर गई हैं, सास.' धनंजय की बात सुनकर गिरधारीलाल पलभर के लिए सहम गए. फिर उसे रुकने का इशारा किया और चाबी लेकर तिजोरी की ओर बढ़ गए.