रोग कैसे उत्पन्न होता है ? ज्वर क्या है ?

रोग कैसे उत्पन्न होता है ? ज्वर क्या है ?
How does the disease arise  ?  What is fever ? 

रोग क्या है, कैसे उत्पन्न और प्रत्यक्ष होता है, बुखार क्या है-आदि बातोंके संबंधमें लोगों में बड़ा भ्रम फैला हुआ है। यदि रोग के स्वरूप का पूरा-पूरा ज्ञान हो जाय तो उसे दूर करने का उपाय भी आसानीसे मालूम किया जा
सकता है और तब अंधेरेमें टटोलनेका कोई कारण ही नहीं रह जायगा।

कुछ रोगों में शरीर में कुछ-न-कुछ परिवर्तन अवश्य देख पड़ता है । भले ही सबमें एक-जैसा न हो, पर होता है अवश्य । इसका अर्थ यह हुआ कि स्वस्थ शरीर का एक साधारण रूप होता है और उस रूपमें परिवर्तन रोग का ही परिणाम हुआ करता है । गर्दन और शक्ल में जो परिवर्तन देख पड़ता है वह उदर से आरंभ होनेके कारण उदर में और कमर के नीचे और अधिक होता है । विजातीय द्रव्य मलमार्गों से बाहर न निकल सकने पर मांसपेशियों में पहुंच जाता है जिससे शरीर कुछ फैल जाता है जब पेशियोंका तनाव इतना बढ़ जाता है कि वे और स्थान नहीं दे सकती तब यह द्रव्य पेशियोंकी बगल में त्वचाके नीचे एकत्र होने लगता है। गर्दन और शक्ल का परिवर्तन इसी अवस्थामें प्रत्यक्ष होता है।

गर्दन और शक्लका यह परिवर्तन, उनमें विजातीय द्रव्यका एकत्र होना इस बातका प्रमाण है कि वह शरीरके अधोभागमें अधिक मात्राएं एकत्र हुआ होगा; क्योंकि नीचे, उदरमें एकत्र होनेके बाद ही वह ऊपरकी ओर बढ़ता है। लोगोंको इस बातका ज्ञान नहीं होता कि गलत जगह में एकत्र इस द्रव्यका शरीर कोई उपयोग नहीं कर सकता और यह उसका अंश नहीं है । वे यह भी नहीं जानते कि यह द्रव्य ही रोगका कारण है या रोगके ही कारण यह द्रव्य एकत्र हुआ है । गुरुत्वाकर्षणके सिद्धान्तके अनुसार यह द्रव्य पहले शरीरके एक ही पार्श्व में-विशेषकर जिस करवट लोग सोया करते हैं-अधिक जमा होता है। रोगका जोर भी प्रायः उसी भाग में देख पड़ता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि यह द्रव्य ही रोगका कारण है। यदि बात ऐसी न होती तो रोगका रूप सर्वत्र एक-सा होता या और भागों में उसका ज्यादा जोर होता । इससे यह भी सिद्ध होता है कि यह द्रव्य शरीर का अंश न होकर विजातीय है; क्योंकि शरीरका पोषक द्रव्य एक ही स्थलपर एकत्र नहीं हो सकता । यदि ऐसा होता तो एक ही करवट सोनेपर स्वस्थ शरीर-में भी यही बात देख पड़ती ।

शरीर इस विजातीय द्रव्य को बाहर निकालने का प्रयत्न बराबर करता रहता है । पसीना, फोड़े, मसूरिका आदि उसके इसी प्रयत्न के परिणाम है । रोग के दूर हो जानेपर, विजातीय द्रव्यके बाहर निकल जानेपर शरीर को बड़ा आराम मालूम होता है, वह 'स्वस्थ' हो जाता है । इससे स्पष्ट है कि शरीर में विजातीय द्रव्यका रहना ही रोग है और उसके बाहर निकलते ही रोग का आप-ही-आप अंत हो जाता है, और शरीर साधारण अवस्थामें आ जाता है ।
विजातीय द्रव्य शरीर में आता कहां से है ?

शरीरमें ऐसे दो ही मार्ग हैं जिनके द्वारा कोई पदार्थ उसमें प्रवेश कर सकता है। इन मार्गों के द्वारपर रक्षाके लिए पहरेदार तो हैं पर वे ऐसे नहीं हैं कि उन्हें कर्तव्य-पथसे विचलित न किया जा सके । ये दोनों द्वार नाक और मुंह हैं-एकसे तो हवा भीतर प्रवेश करती है और दूसरेसे आहार । यदि हम इनकी पसंद का खयाल न कर इनकी उपेक्षा करते जाय तो ये भी अपने कर्तव्य-पालन में ढीले पड़ते जाते हैं और अनिष्टकर पदार्थोंको भी, जो शरीरका अंश नहीं बन सकते, बिना किसी रोक-टोक के अंदर प्रवेश करने देते हैं । सिगरेटबाजोंकी मंडली में बैठा हुआ धूम्रपान से परहेज करनेवाला व्यक्ति भी सिगरेटका विषाक्त धुआं स्वच्छ वायु की तरह साॅस के जरिये अंदर पहुंचाता रहता है । घाणका विषय परिमित होनेके कारण नाक के तो कम, पर अनेकानेक प्रलोभन प्रस्तुत होते रहनेसे जीभके पतित होनेकी बहुत अधिक संभावना रहती है । रोज ही हमारे सामने ऐसी-ऐसी मसालेदार और चटपटी चीजें आती रहती हैं जिन्हें हमारे पूर्वजोंने स्वप्नमें भी न देखा होगा। उचित तो यह है हम इनसे परहेज करें, पर ऐसा न कर हम उन्हें गलेतक ठूस लेते हैं और इस प्रकार अस्वास्थ्यकर वस्तुएं अधिक मात्रामें अंदर पहुंचाकर अपने पाचनयंत्रको खराब कर लिया करते हैं। ।

पाचनयंत्र कैसे कमजोर या खराब होता है-यह एक उदाहरणसे स्पष्ट हो जायगा। जो टट्टु दो मनका बोझ ढोया करता है उससे आप चाबुकके जरिये दो-एक बार या कुछ दिनोंतक वोन मनका बोझ ढुलवा सकते हैं । यदि आप रोज इतना ही बोझ लादते जायं तो कुछ दिनोंतक तो वह किसी तरह ढो ले जायगा, पर उसका यह अधिक बोझ ढोना उसके लिए बहुत हानिकर होगा; कुछ दिनोंके बाद वह दो मनका पहला बोझ भी न ले जा सकेगा और आगे चलकर तो यह जवाब ही दे देगा । ठीक यही बात पाचन-यंत्रके संबंधमें भी कही जा सकती है । आधुनिक उत्तेजक पदार्थोंके सहारे कुछ दिनों क्यों, बहुत दिनोंतक वह काम करता जायगा, पर उसको शक्ति दिनोंदिन क्षीण होती जायगी और एक दिन वह बिलकुल निःशक्त हो जायगा । यह क्रिया-स्वास्थ्यसे अस्वस्थताको ओर बढ़नेको गति-इवनो अलक्षित और धीमी होती है कि मनुष्यको बहुत दिनोंतक इसका भान भी नहीं हो पाता। रुग्ण आंतोंके लिए आहारकी क्या उपयुक्त मात्रा होगी, यह कहना आसान नहीं है। अगर किसीके लिए एक सेब लाभदायक हो सकता है तो दो हानिकारक हो जायंगे। जितना वह पूरा-पूरा पचा सके वही उपयुक्त मात्रा है, उससे अधिक वह जो कुछ खायगा वह उसके लिए विपके समान होगा और यदि वह मलमार्गोंसे शरीरके बाहर न निकल सका तो वही विजातीय द्रव्यके रूपमें शरीरमें एकत्र होगा।
इस द्रव्यसे शरीरके क्षयकी पूर्ति में तो सहायता मिलती नहीं, ऊपरसे यह संचलनक्रियामें बाधक होकर पाचनकी क्रिया भी मंद कर देता है । यह प्रायः मलमार्गों के पास ही एकत्र हुआ करता है और अगर रहन-सहनमें शीघ्र परिवर्तन न किया जाय तो एक बार एकत्र होना आरंभ होनेपर दिनोंदिन बढ़ता ही रहेगा। उपर्युक्त गर्दन और शक्लका परिवर्तन इसी अवस्थामें आरंभ होता है। इस स्थितिमें शरीर रुग्ण ही रहता हैं, पर रोग जीर्ण होते हुए भी कष्टदायक नहीं होता। रोगको वृद्धि इतनी मंथर गतिसे होती है कि बहुत दिनोंतक उसका पता ही नहीं चलता; पता तब चलता है जब पहले-जैसा न तो शारीरिक श्रम हो पाता है और न मानसिक । मलमार्गोंके जैसे-तैसे काम करते रहनेसे काम चलता जाता है, उनके अशक्त हो जानेपर ही अवस्था कष्टदायक या चिंताका कारण होती है।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है, विजातीय द्रव्य आरंभमें मलमार्गोके पास ही एकत्र होता है, पर बादमें वह अन्य भागों, विशेषकर ऊपरके भागोंमें फैलने लगता है। गर्दनमें यह स्पष्ट रूपसे देख पड़ता है । गर्दन घुमाते समय जिधर तनाव मालूम हो, समझना चाहिए कि विजातीय द्रव्य उसी मार्गसे आगे बढ़ा है । इस द्रव्यके कारण शरीरका विकास भी रुक जाता है; क्योंकि जहां यह एकत्र होता है वहां रक्तका संचलन समुचित रूपसे न होनेके कारण वह भाग पोषक तत्त्वोंसे वंचित हो जाता है । रोगकी प्रगति कहांसे आरंभ हुई है, इसका भी निश्चय
करना कठिन होता है; क्योंकि बहुतसे लोग विजातीय द्रव्यका भार लिये पैदा ही होते हैं । शैशवावस्थामें तरह-तरहके रोग होनेका यही कारण हुआ करता है।

यह द्रव्य बहुत दिनोंतक उसी रूपमें पड़ा रहता है, पर मौसम, भावावेश या उ.न्य कारणोंसे परिस्थिति अनुकूल होनेपर शीघ्र ही उसका रूपांतर हो जाता है । घुलने और गलनेवाला होनेके कारण वह ऐसे रूपमें परिणत हो जाता है कि उससे खमीर पैदा हो सके। यह खमीर शरीरमें प्रायः बनता रहता है । रोगोत्पत्तिके संबंधमें यही सबसे
अधिक महत्त्वकी बात है । यह क्रिया उदरमें आरंभ होती है और साधारणतः दस्तके रूपमें विजातीय द्रव्य बाहर निकल जाता है, पर अगर कब्जकी शिकायत रही तो खमीर बनना जारी रहेगा और वह ऊपरकी ओर उठेगा । अगर आप बोतलमें कोई द्रव पदार्थ-किसी फलका रस-रख दें तो उसमें गर्मी पहुंचनेपर पहले नीचेके हिस्सेमें खमीर बनना शुरू होगा, बादमें वह ऊपरकी ओर बढ़ेगा। शरीरका खमीर भी ठीक इसी तरह ऊपरकी ओर बढ़ता है और हमें सिरदर्दके रूपमें इसका अनुभव होता है । इसके अनंतर विजातीय द्रव्यके कणोंके आपसके और
त्वचाके साथ उनके संघर्षसे और खमीर बननेकी क्रियासे भी जो गर्मी पैदा होती है उसका हमें अनुभव होने लगता है। इसी गर्मीको हम लोग ज्वर कहा करते हैं । इस प्रकार ज्वर तभी होता है जब शरीर में विजातीय द्रव्य मौजूद हो और वह बाहर न निकल सके अर्थात् मलमार्ग अपना काम ठीक तरहसे न कर रहे हों । इससे स्पष्ट है कि ज्वर और कुछ नहीं, शरीरके अंदर होनेवाली खमीर बननेको क्रियाका ही नाम है। जिस प्रकार गर्मीके कारण द्रव्य पदार्थोंमें खमीर पैदा होता है उसी प्रकार ग में ही शरीरस्थ विजातीय द्रव्यका भी खमीर बनता है । यही
कारण है जिससे गर्म देशोंमें ठंढे देशोंको अपेक्षा ज्वर अधिक हुआ करता है।

ज्वरकी हालतमें मनुष्यका शरीर कुछ फैल भी जाता है, क्योंकि चमड़ा फैलनेवाला होनेके कारण खमीरको उसपर क्रिया होने लगती है । जब तनाव इतना बढ़ जाता है कि त्वचा और आगे बढ़नेसे इनकार कर देवी है तब ज्वर और उसके साथ ही खतरा भी बहुत बढ़ जाता है । खमीरमें फैलनेकी प्रवृत्ति होती है, पर ऊपरसे रोग लग जानेके कारण वह भीतरकी ओर अपने लिए स्थान ढूंढ़ने लगता है जिससे शरीर भीवर-ही-भीतर जलने लगता है और मृत्यु अनिवार्य हो जाती है। अगर किसी तरह इस खभीरको निकल नेका मार्ग मिल जाय तो ज्वरका जोर कम हो जायगा और खतरा भी टल जायगा। अगर मार्ग न मिला तो जिस अंगपर उसका ज्यादा असर होगा उसे वह नष्ट कर डालेगा ।
इस संबंधमें एक बात और जान लेना आवश्यक है। गर्मी बढ़नेके पहले कुछ कालतक थोड़ी ठंढ मालूम होती है। यह तभी होता है जब विजातीय द्रव्य इवना बढ़ जाता है कि रक्तका प्रवाह रक्त-नलिकाओंके छोरवक नहीं पहुंच पाता और दबाव भीतरकी ओर बढ़ जाता है। इस प्रकार यह ठंढ ज्वरकी पूर्वसूचना होती हैं जिसकी ओर ध्यान न देना बहुत बड़ी भूल है । अगर इसी समय समुचित उपचार आरंभ हो जाय तो ज्वर बढ़ने ही न पाये ।

खमीर बननेको क्रिया शुरू होनेपर दंडारण (बेसिलस) पैदा होने लगते हैं । लोगोंका कहना है कि संक्रामक रोगोंके कीटाणु इन्हींके द्वारा शरीरमें प्रवेश करते हैं । यदि विजातीय द्रव्यका खमीर न बने तो इन कीटाणुओंके प्रवेश करनेको भी कोई संभावना नहीं रहेगी । इसलिए प्रश्न दंडारणओंका अंत करनेका नहीं, बरिक विजातीय द्रव्यको शरीरमें एकत्र न होने देने या यदि एकत्र हो तो उसे बाहर निकालनेका है । इस द्रव्यके बाहर निकल जानेपर ये छोटे दानव जिन्होंने अनगिनत लोगोंके दिमागमें संक्रमणका हौआ पैदा कर रखा है, आप-से-आप नष्ट हो जायंगे ।

एक उदाहरणसे यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जायगी । अगर किसी कमरेकी बहुत दिनोंतक सफाई न हो और उसमें गंदगी जमा होती रहे तो उस कमरेपर कीड़े-मकोड़े कब्जा जमा लेंगे और रहनेवालोंकी नाक में दम कर देंगे । अगर पुराने तरीकेसे किसी विषके द्वारा उन्हें नष्ट करनेका प्रयत्न किया जाय तो इससे स्थितिमें कोई विशेष अंतर नहीं आयेगा; जिवने मरेंगे उससे कई गुने उस गंदगीसे फिर पैदा हो जायंगे। इसके बजाय अंगर कमरेकी गंदगी ही दूर कर दी जाय तो स्थितिमें आमूल परिवर्तन हो जायगा । उनकी उत्पत्तिका मूल कारण दूर हो
जानेपर उनसे कमरे में रहनेवालोंका पिंड छूट जायगा । गर्मीक दिनोंमें दलदल या नम जमीनमें बहुत बड़ी संख्यामें मच्छर पैदा हो जाते हैं। यदि उन्हें किसी विषैली दवासे या और किसी

तरह एक बार नष्ट भी कर दिया जाय तो वे फिर पैदा हो जायंगे । यदि उन्हें एकत्रकर किसी शुष्क पहाड़पर पहुंचा दिया जाय तो भी वे वहां कभी न टिकेंगे, फौरन पहले स्थानपर लौट आयेंगे । उष्ण देशोंमें जीव-जन्तु बहुतायतसे होते हैं तो उनको खानेवाले जीव भी बहुतसे होते हैं । इन मांसाहारी जीवोंका यदि अंत करना हो तो पहले उनका शिकार या खाद्य पदार्थ नष्ट करना पड़ेगा।

इन बातोंसे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रकृति किस प्रकार बड़े पैमानेपर कार्य करती है। छोटे क्षेत्रोंमें भी प्रकृतिका यही नियम काम करता है । क्षेत्र छोटा-बड़ा होनेके कारण प्रकृतिके नियममें कोई अंतर नहीं आता इसलिए यदि दंडाणुओंका अंत करना है तो उन्हें विषवाली दवाओंसे मारनेकी जरूरत नहीं है। उनके अस्तित्वका आधार न रहनेपर वे आप ही नष्ट हो जायंगे । सारांश यह कि स्वास्थ्यके लिए, रोगोंका निवारण करनेके लिए शरीरमें विजातीय द्रव्यको एकत्र न होने देने और एकत्र द्रव्यको बाहर निकालनेका प्रयत्न करना आवश्यक है; क्योंकि यह विजातीय द्रव्य ही रोगका मूल कारण है, उसका बाहरी रूप चाहे जैसा भी हो।





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