समस्या ( एक माँ की कहानी )


समस्या
( एक माँ की कहानी )

घर के साथ-साथ माता-पिता का भी बंटवारा हो गया था. माता की जिम्मेदारी छोटे ने संभाल ली थी और पिता की बड़के ने. दिसंबर में पिता का निधन हो गया. 'अब माता का क्या किया जाए?' बेटों के सामने गंभीर प्रश्न उपस्थित हो गया. बैठक आयोजित की गई. विचार- विमर्श के उपरांत तय हुआ कि माता एक माह छोटे के पास रहेंगी और अगले माह बड़के के पास. फैसला होने के तुरंत बाद छोटे ने बड़के से कहा, 'जनवरी में आप रखो, अपने पास. फरवरी में मैं लेकर आऊँगा.'कोई बात नहीं...,' बड़के ने हामी भरी. तभी उसकी नजर दीवार पर टंगे कैलेंडर पर पड गई. 'भई. जनवरी में आप ही रखो, मैं फरवरी में लेकर जाऊँगा,' उसने कहा. 'नहीं...नहीं, जनवरी में आप संभालो. मैं फरवरी में संभालूंगा.' 'नहीं...नहीं...' दोनों भाई एक दूसरे को कहते रहे पर जनवरी की जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार न हुआ. 'मेरे दफ्तर का समय हो रहा है,' कहकर बड़का उठकर चला गया. बिना किसी फैसले के बैठकसमाप्त हो गई, माता उठकर पूजाघर में गई और ठाकुरजी की मूर्ति के सामने बैठकर प्रश्न करने लगी, "आपने सारे महीने एक समान क्यों नहीं बनाए, प्रभु? कोई इकतीस दिन का तो कोई अट्ठाइस का काहे बनाया....देख लो, मेरे बच्चों के सामने आज कितनी बड़ी समस्या खड़ी हो गई?'

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